Saturday, 10 November 2018

हथेलियों पर ...

वो जो खिड़कियों की रोशनी से ,
छनकर आ जाता था वक़्त-बेवक़्त
उसकी मौजूदगी महसूसती साँसे,
उतरती जाती थीं गहरे कहीं...
बूँद-बूँद के संगीत को,
 सुन लिया था जिसने ...
रोक लिया था जिसने,
 तूफान अपनी आँखों में...
वो बह गया था नीर सा देखने से ही ,
मर्यादाओं की कँटीली राह जिसने
लाँघी ही नही ...
वो डोलता रहा दो तराजुओं के बीच ,
उसकी हथेलियों पर निशान बनते गए
जो उसके  लिए न थी....
कितनी शिद्दत से उकेरता था
किसी को जिस्म पर ...
वो नाम फिरभी उसकी पहचान तो न थी ,
हर बात हँसकर वो मानता रहा ,
उसकी जबान पर कोई जुबान न थी ...
सो गया था वो जिसकी आगोश में ,
कैसे कहें... उसकी मोहब्बत
कब्रगाह  सी थी...
                    -संगीता




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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...