Friday, 9 November 2018

कुछ किया नही....

कटोरों में खनकते चंद सिक्के
शोर जोर की करते हैं....पर,
दिन भर झुलसाती धूप के कानों तक
जूं नही जाती ।
भरे कटोरे के साथ,
देखा नही उसे कभी
हथेली भर पाँव वाले के हाथ
पसरते हैं  एक आस में .....
दुत्कार की रोटी
अपमान का निवाला
गले उतारना
वह सीखता है....
सीख नही पाता वह
भूख को सुलाना
अंधी आँखों का रौशन जहाँ
बुझ जाता है हल्की सी फूँक से
फिर.... खनकता कटोरा ....
और हमने ...
कुछ किया ही नही ....
                       -संगीता


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...