Sunday, 3 November 2019

हाँ...

खामोशियों को
मुस्कुराहटों के लिबास में ढककर
बढ़ चले थे कदम.....
पास आकर कहा उसने,
रोशनी की चाह
अंधेरे का सफर है...
           -डॉ०संगीता



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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...