Wednesday, 5 February 2020

ऐसा ही है

अनुभवों की आँच पर,
तप- तप कर निखरे हैं।
खुशियों को समेटते हुए,
हम तो बिखरे हैं।
पा लिया है थोड़ा सा ,
अपना आसमान भी ।
यही पाने की चाह में ,
आँधियों से गुजरे हैं।
                    -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...