Tuesday, 17 March 2020

एक सी शक्लें..

तकलीफों के दामन में
काटों की किस्म -किस्म की शक्लें
पर,चुभते एक से हैं।
हर कहीं देखा,
दर्द की भरी दुकान में,
 कोई भी दर्द मीठा नही होता।
भर जाती है झोली
बिन मांगे...
दामन अपने -अपने हैं
काटें भी अपने -अपने
                   -संगीता


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...