वह उसे कहता कुछ न था,
जिससे अलग वह न था,
तंतु से तंतु उलझा तो था,
पर,गाँठ कहीं पड़ा न था।
तरंगों का आना -जाना था,
पर,दोनों मुँह पर ताला था,
भेद दोनों का खुला-खुला था,
फिर भी,गला रुधा-रुधा था।
जो भी था अनजाना सा था ,
गैरों में भी पहचाना सा था,
लिपटना जिससे न गवारा था,
फिर भी,आज उसी से हारा था।
-डॉ०संगीता
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