कबसे बड़ी कोशिश किया जा रहा है,
कि शब्द हैं ,जिनसे न जिया जा रहा है।
खामोशियों की लिपटती परतें तो हैं
पर,शोर क्यों दिल किये जा रहा है।।
चंद शब्दों की आवाजाही भी बंद है,
हाथों में खुली किताब, रोशनी पाबन्द है।
सोचने -समझने की ताकत भी जा रही है,
जो बनी थी जरूरत ,आज वही जरूरतमंद है।
-डॉ०संगीता
कि शब्द हैं ,जिनसे न जिया जा रहा है।
खामोशियों की लिपटती परतें तो हैं
पर,शोर क्यों दिल किये जा रहा है।।
चंद शब्दों की आवाजाही भी बंद है,
हाथों में खुली किताब, रोशनी पाबन्द है।
सोचने -समझने की ताकत भी जा रही है,
जो बनी थी जरूरत ,आज वही जरूरतमंद है।
-डॉ०संगीता
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