Monday, 8 June 2020

आज फिर...

कबसे बड़ी कोशिश किया जा रहा है,
कि शब्द हैं ,जिनसे न जिया जा रहा है।
खामोशियों की लिपटती परतें तो हैं
पर,शोर क्यों दिल किये जा रहा है।।
चंद शब्दों की आवाजाही भी बंद है,
हाथों में खुली किताब, रोशनी पाबन्द है।
सोचने -समझने की ताकत भी जा रही है,
जो बनी थी जरूरत ,आज वही जरूरतमंद है।
                                        -डॉ०संगीता  

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...