Monday, 22 June 2020

आज फिर...

नन्ही सी शाख पर आती नही
कोई कोमल सी मुस्कान
फिर कोई गर्म पानी  सा
जड़ों को छू गया....
दर-दर भटका था जो
चंद टुकड़ो के लिए
आज फिर उसी तरह
खुद को खो गया...
काश कुछ निवाले
भूख को मिटा दे
यही सोचकर
 वह,आज फिर सो गया....
                  -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...