Tuesday, 1 June 2021

कुछ बातें... 4

प्रेमिका की याद... आज कितने सालों बाद तुम ठीक मेरे सामने थी, तुम्हारे होठ खिल-- खिलकर मुझसे छुपना चाहते थे।हम दोनों की आँखों में खुशी के आँसू एक साथ तैरने लगे ,तुम तो उन्हें आँखों में संभाल भी नही सकी।आँसुओं ने तुम्हारे गाल गीले कर दिए।स्वर तन्त्रियाँ जैसे स्थिर हो गई हो, हम दोनों ही कुछ बोल न सके ,कुछ कह न सके....बहुत कुछ कहना चाहता था मैं ...और शायद तुम भी ....पर बिन कहे हम दोनों ही फिर दूर होने लगे पिछली बार की तरह। यादें भी न जाने क्यों गले पड़ जाती हैं, जैसे यादें नहीं तुम ही हो।जब भी तुम्हें याद करता हूँ ,तुम्हारी गली के हजारों गुलाब मुस्कुराने लगते हैं ,और अपनी खुशबुएँ जैसे तुमपर लुटा रहे हो।उसी गली से गुजरते हुए जब तुम्हारी उंगलियों ने मेरी उंगलियों को छू लिया था,मैं तुम्हें बता नही सकता कि कितनी तरंगे मुझे अपने साथ बहा ले जाना चाहती थीं....कामनाएं क्या होती हैं... शायद उस दिन मैंने जाना था,झूठ नही कहूँगा उस दिन मैं तुम्हें दुबारा छूना चाह रहा था .....तुम्हारे हाथों को सहलाना चाह रहा था।आज फिर जब तुम मुझे अपने आस-पास महसूस हो रही हो ...वो तरंगे मुझे फिर जैसे बहा ले जाना चाहती हों....शायद तुम्हें भी ऐसा लगा हो .....शायद।न जाने कितनी बार तुम्हें एक बार और देखने की चाहत होती रहती थी ।तुम्हारी गली में मुड़ते ही मुझे ऐसा लगता था कि ये पूरी गली तुम्हारी ही है इस गली का कण-कण तुमने छुआ होगा ।न जाने प्रेम का ये एहसास क्या है कि मुझे कोई बात बुरी नही लगती थी ,लगता था कि इस दुनिया में दुःख नही बस प्रेम ही प्रेम है।तुम्हारे नाम मे जैसे मुस्कान घुली हो जो हर पल मेरे होठों पर टहलती रहती थी। पता है मुझे तुमने भी मुझे भुलाया नही है।तुम मुझे खुश देखना चाहती थी,तुम्हें लगता था कि शायद तुम्हारे जाने के बाद मैं खुद को हार जाऊँगा।तुम गलत नहीं थी,हार तो मैं जाता ही गर मुझे तुम्हारी खुशी का ख्याल न आता ...तुम जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर दिखते रहना.. - मेरी ही कलम से

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...