Thursday, 17 June 2021

कुछ बातें..7

गलियों की चहलकदमी और रौनक के बीच झील सी आँखों में जैसे बाढ़ सी आ जाती है।अपने ग्राहकों को रिझाने की हर कला में माहिर उस औरत के होठों को स्टेपलर जैसे अचानक से स्टेपल कर देता है कि जैसे फिर कभी खुलेंगे ही नही।पर,उस गली से उसके मनोहर के मुड़ते ही उस औरत के होंठ अपने आप खुल जाते हैं, और वो बिकने के लिए फिर अपने कौशल का प्रदर्शन करने लगती है।यही हर रोज होता,क्या उसे नही पता कि इस गली की कौन सी औरत जात अपने जिस्म को छुपा पाई है, उन एक्सरे जैसी आँखों से।यहाँ तो कोई मापनी भी नही ,फिर भी माप लेते हैं,जैसे दर्जी रफू वाली चीज में कितना धागा भरना है जाने कैसे जान लेता है।ये भी तो उसी हिसाब से देते हैं.....रुपये उस समय आत्मा से बड़े नजर आते हैं।आत्मा का क्या है ,वह तो बस शरीर में छटपटाती रहती है, कचोटती है, त्राहि-त्राहि करती है।पर,गूँगी जो है उसकी आवाज किसी के कान तक जाती है। आज दो दिन से वो इस गली से नही गुजरता,कहीं उसने गली तो नही बदल ली।नही नही ..हो सकता है ,उसका कोई काम इधर न हो।हाँ... यही हो सकता है।उसकी आँखों ने तो मेरी एक झलक भी नही देखी फिर भी ऐसा लगता है कि वो मुझे ही देख रहा है, मैं ओट तो ले लेती हूँ ,कि वो मुझे देख न ले उसको देखते हुए...पर...सच तो यह है कि उस समय दिल यही चाहता है कि वो एक नजर मुझे देख ले ।उसकी बाइक की आवाज ही अलग सी लगती है, इस गली में घुसने से पहले ही उसकी गाड़ी की आवाज मेरे कानों तक आ जाती है।तभी तो उस समय से पहले ही मैं यहाँ आ जाती हूँ ,यहाँ से गली की मोड़ जो दिखती है।काश मेरी आँखें उसे हरपल देखती रहती।मुझे न जाने कितनों ने अपना खिलौना बनाया एक ऐसा खिलौना जो दूसरों की मर्जी से चलता है।मेरे अंगों की खूबसूरती को मैंने इससे पहले नही देखा था हर एक अंग में थिरकन सी दौड़ जाती है उसके याद करते ही।उसे तो मैं हर एक साँस की तरह लेती हूँ, छोड़ती हूँ ,फिर लेती हूँ।न जाने क्यों चाहती हूँ वो मुझे देखे मुझे महसूस करे..पर वो नही आता। कितने दिनों से उसे देखना चाहती हूँ, पर देख नही पाती।प्रेम शहद सा मेरे भीतर इतना भर गया है, कि अब डरती हूँ ,कहीं बीमार न हो जाऊं....काश उससे यह कह पाती की तुमसे कितना प्यार करती हूं ,चाहती हूँ कि तुम मुझे मिलो ....तुम मिलो न मिलो पर मैं तुम्हें कभी इस दहलीज़ के भीतर नही देखना चाहती ,तुम कभी भी यहाँ न आना... तुम्हें बिना देखे जी लूँगी पर यहाँ जो देखा तो जी न सकूँगी... अपनी ही कलम से

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...