Sunday, 3 July 2022

कुछ बातें....22

अंशिका की आवाज की गहराई वह क्या समझे।रत्न मैं.... तुम्हारी तस्वीर बार बार देखती हूँ और हर एक याद से जुड़ती हूँ।तुम चाह कर भी वो लम्हे लौटा नहीं सकते,तो एक नया लम्हा ही बना दो।कम से कम इसी बहाने तुम साथ तो रहोगे।मुझसे जुड़े तो रहोगे।अंशिका की मनुहार सुने बिना ही रत्न ने उससे मुह फेर लिया।उसे उसके जीवन का नया पड़ाव जो मिल रहा था।उसके लिए तो हर सफर में में एक सराय मिल ही जाता है।उसे कहाँ एहसास है कि सराय घर नही हुआ करते। मेरे ही कलम से..... ​

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...