Wednesday, 29 May 2024

घड़ी के तीन काँटें

 घड़ी के तीन काँटो का शोर 

समझते ही ...

झकझोर गया कोई जैसे

सबसे अधिक शोर 

क्षण क्षण का था 

जो,नाली के कीड़े जैसी 

मूल्य रहित मौत की ओर

इशारे कर रही थी 

जी किया, समय यंत्र भंग हो जाये

पर, रुकता तो यंत्र 

समय यंत्र से निकल आगे 

बढ़ रहा था...

ये तीन काँटे,

समझ से परे


No comments:

Post a Comment

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...